महेश झालानी
राजस्थान की राजनीति में डॉ. किरोड़ी लाल मीणा का अतीत जितना लाठियां खाने, जेल जाने और जनता के लिए व्यवस्था से टकराने का रहा है, उनका वर्तमान भी उसी उग्र और बेबाक स्वभाव से संचालित हो रहा है। विपक्ष में रहते हुए जब अन्य नेता बंद कमरों में रणनीति बनाते थे, तब वे पानी की टंकी पर चढ़कर या आधी रात को सड़कों पर लेटकर सरकार की नाक में दम करते थे। आरपीएससी पेपर लीक के खिलाफ उनका आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण था, जिसने राजस्थान के लाखों युवाओं के मन में यह भरोसा जगाया कि यह व्यक्ति उनके हक के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। यही कारण है कि वे पूरे राजस्थान में और विशेषकर युवाओं व ग्रामीणों के बीच ‘बाबा’ के नाम से विख्यात हो गए।
यह नाम उन्हें किसी उपाधि की तरह नहीं मिला, बल्कि जनता ने उनके संघर्षों को देखकर उन्हें इस आदरणीय नाम से नवाजा है। भजनलाल सरकार में कैबिनेट मंत्री बनने के बाद भी ‘बाबा’ का यह स्थापित ‘ट्रैक रिकॉर्ड’ बदला नहीं है और वे आज भी दफ्तर से ज्यादा फील्ड में ही सक्रिय दिखाई देते हैं। हाल ही में औद्योगिक क्षेत्रों में उनके द्वारा मारे गए अचानक छापे और नीट जैसे संवेदनशील मामलों पर अपनी ही सरकार के दौर में खुलकर कमियां स्वीकार करना यह साफ करता है कि उनका बुनियादी स्वभाव आज भी एक विद्रोही और खोजी नेता का ही है। भ्रष्टाचार को उजागर करना और उसकी जड़ तक पहुंचना बाबा की राजनीति की मुख्य ताकत रही है । इसी वजह से न केवल प्रशासनिक हलकों के अफसर, बल्कि खुद उनकी अपनी पार्टी के नेता भी अक्सर उनसे सतर्क रहते हैं।
व्यवस्था के भीतर किसी भी स्तर पर होने वाली गड़बड़ी को वे सार्वजनिक करने से नहीं हिचकिचाते । साथ ही बाबा को कभी भी ‘मैनेज’ नहीं किया जा सकता। हालांकि प्रशासनिक गलियारों में उनके इस उग्र रूप के साथ-साथ उनके ‘नरम दिल’ की भी खूब चर्चा होती है। वे जितने कड़क हैं, उतने ही संवेदनशील और भावुक भी हैं । यदि कोई अधिकारी अपनी गलती स्वीकार कर लेता है और जनता के काम को सही ढंग से करने का वादा करता है, तो बाबा का गुस्सा शांत होने में वक्त नहीं लगता और वे उसे माफ भी कर देते हैं।
दूसरी ओर, उनकी राजनीति का एक पहलू ऐसा भी है जिसके कारण वे हमेशा आलोचकों के निशाने पर रहते हैं। विरोधियों का सीधा आरोप है कि पब्लिसिटी ही किरोड़ी लाल मीणा की मुख्य खुराक है । मीडिया की सुर्खियों में बने रहने के लिए वे जानबूझकर ऐसे नए-नए राजनीतिक स्टंट और ड्रामे करते हैं जो संस्थागत शासन को कमजोर करते हैं। सरकार के भीतर रहते हुए भी आंदोलनकारी की तरह व्यवहार करना कई बार सरकार के सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत को असहज कर देता है । हालांकि उनके समर्थक इसे स्टंट नहीं, बल्कि जनता की आवाज उठाने का उनका अपना अनोखा अंदाज मानते हैं।
इसके साथ ही, बाबा की राजनीति का सबसे कमजोर सिरा ‘भाई-भतीजावाद’ और परिवारवाद के आरोपों पर आकर टिकता है। खुद को साधारण कार्यकर्ताओं का मसीहा बताने वाले मीणा पर अपने परिवार को राजनीतिक रूप से स्थापित करने के गंभीर आरोप हैं । क्योंकि उनकी पत्नी गोलमा देवी पहले ही विधायक और मंत्री रह चुकी हैं । भतीजा राजेंद्र मीणा वर्तमान में विधायक हैं । इसके अतिरिक्त अपने भाई जगमोहन मीणा को टिकट दिलवाने और विधायक बनाने के लिए अपनी पूरी राजनीतिक ताकत लगा दी थी । हालांकि जनता ने उनके इस प्रयास को स्वीकार नहीं किया और उनके भाई को शिकस्त का सामना करना पड़ा।
इस पूरे परिदृश्य को मिलाकर देखें तो बाबा का मंत्री के रूप में मूल्यांकन पारंपरिक कसौटियों पर नहीं किया जा सकता। उन पर परिवारवाद के दाग भी हैं और पब्लिसिटी के भूखे होने के आरोप भी लगते हैं । लेकिन इन तमाम कमियों और विरोधाभासों के बावजूद वे राजस्थान की राजनीति के एक ऐसे अनिवार्य सच हैं जिन्हें कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता। वे भाजपा के उन विशिष्ट नेताओं में से हैं जिनका अपना एक मजबूत और स्वतंत्र जनाधार है, जो किसी सरकारी पद या पार्टी के टिकट का मोहताज नहीं है। पद पर रहते हुए भी वे मूलतः मैदान के ही नेता बने रहे है । यही वजह है कि तमाम विवादों और पराजयों के बाद भी राजस्थान के जनमानस में उनका व्यक्तिगत प्रभाव और ‘बाबा’ की यह छवि आज भी अटूट बनी हुई है।